Wednesday, November 26, 2014

तूफ़ान

शहरों में गिरता हैं तिनका तो शोर मच जाता हैं ...
और तूफ़ान का चर्चा, चंहूँ ओर पहुँच जाता हैं ....
यूँ ही गिर जाते हैं दरख्त जंगलों में ...
आवाज होती हैं मगर सुन कोई नहीं पाता हैं ....
दोस्त, इंसानों की दुनिया के नियम भी बड़े अजीब हैं ....
यहाँ तूफ़ान के जोर पर उड़ते तिनकों का बवंडर  तो नजर आता हैं ....
पर जमीदोज हुआ दरख्त और उसके निशान नज़रअंदाज हो जाते हैं ....

Thursday, November 20, 2014

दिल कुकुरमुत्ता

तुम लाख लगा लो पहरे, 
ओठों को मुस्कुराने का बहाना मिल ही जाता हैं ...
......

जिन्दगी तेरी हलचल से,
दिल बहलाने का सामान मिल ही जाता हैं ...
......
तुम सामने हो मेरे और हर लम्हा जज्ब हो रहा हैं,
मेरी भावनाओं के सागर में, तुम्हारा अक्स प्यार से तर हो ही जाता हैं ....
......

तेरा प्यार झूठा ही सही, पर दिल बड़ी चीज हैं ,
मान लो तुम की ओस की बूंदों से भी, दिल कुकुरमुत्ता खिल ही जाता हैं ...

Thursday, November 13, 2014

तुम्हारे ख़यालों में ....

हर रात मैं, विचारों के शूलों से उलझ जाता हूँ,
          और सुबह तुम्हारे लिए, इक नया गुलाब लाता हूँ .
नहीं जानता तुम्हे पसंद आएगा भी या नहीं ?
           हर बार की तरह इस बार भी ......
हैं तुमसे प्यार, यह जाताना आएगा भी या नहीं ?
           अक्सर तुम्हारे ख़यालों में, इस कदर खो जाता हूँ ;
कुर्सी पर सर टेके ही सो जाता हूँ ..

Sunday, September 14, 2014

क्या मैं नास्तिक हूँ ?

जरूरी नहीं की प्रत्येक नास्तिक व्यक्ती सात्विक हो....
                         आस्तिकता मनुष्य की नकारात्मकता को नियंत्रित करती हैं, माना की मनुष्य के पास बुद्धी हैं पर वह प्रत्येक क्षण बुद्धि को चैतन्य नहीं रख सकता वह जाने-अनजाने बुद्धीहीनता का काम कर देता हैं बहुत से उदहारण हैं ... आस्तिकों की अंधश्रद्धा एक तरह से परमात्मा को नकारने वाली ही बात हैं जो बुद्धीहीनता को बढ़ावा देती हैं और व्यक्ती अपने अहंकार और अज्ञानता से मानवता को क्षति पहुचता हैं .... प्रत्येक आस्था की मान्यताओं में सिधान्तों के साथ करुणा का होना अत्यंत आवश्यक हैं ... जिस मान्यता में भी करुणा तत्व की कमी हैं उसके अनुयायी पूरी मानवता को समाप्त कर देंगे .... आस्तिकता वास्तव में मनुष्य में सात्विकता और मानवता का संचार करती हैं और मानवता,..समाज का निर्माण करती हैं ....
                      बस इतना कहना हैं 'विनोद' की नास्तिक व्यक्ती सात्विक हो तो वह नास्तिकता का दिखावा कर रहा हैं .....

Sunday, September 7, 2014

                      लिखने का शौक तो मुझे स्कूलों के ज़माने से हैं, जब भी मैं कोर्स की किताबें छोड़ कर प्रेमचंद, चन्द्र कांता संतती, और जासूसी उपन्यास पढता कुछ न कुछ लिखने को मेरा मन मचलता रहता था.
                       अपनी कोर्स की कापियों के पिछले पन्नो में अपने विचार लिखता, अपने अनुभव लिखता,  कवितायेँ बनता.... कविताओं से याद आया मैंने आठवी से फ़ाइनल(1993) तक करीब-करीब 450 के लगभग कविताये लिखी थी, जिसका संग्रह 5 कापियों के रूप में मेरे पास था ; पर अनदेखी में न जाने वह कहाँ खो गयी....
                      कुल मिला कर उपरोक्त आदतों का परिणाम मेरी पढाई पर सकारात्मक रूप से पड़ा मुझे किसी भी विषय में ज्यादा पढने - उलझने  और अतिरिक्त प्रयास की जरूरत नहीं पडी ... यह काल ऐसा था की जो भी पढो सीधे आत्मा द्वारा अवशोषित कर लिया जाता था ......