लिखने का शौक तो मुझे स्कूलों के ज़माने से हैं, जब भी मैं कोर्स की किताबें छोड़ कर प्रेमचंद, चन्द्र कांता संतती, और जासूसी उपन्यास पढता कुछ न कुछ लिखने को मेरा मन मचलता रहता था.
अपनी कोर्स की कापियों के पिछले पन्नो में अपने विचार लिखता, अपने अनुभव लिखता, कवितायेँ बनता.... कविताओं से याद आया मैंने आठवी से फ़ाइनल(1993) तक करीब-करीब 450 के लगभग कविताये लिखी थी, जिसका संग्रह 5 कापियों के रूप में मेरे पास था ; पर अनदेखी में न जाने वह कहाँ खो गयी....
कुल मिला कर उपरोक्त आदतों का परिणाम मेरी पढाई पर सकारात्मक रूप से पड़ा मुझे किसी भी विषय में ज्यादा पढने - उलझने और अतिरिक्त प्रयास की जरूरत नहीं पडी ... यह काल ऐसा था की जो भी पढो सीधे आत्मा द्वारा अवशोषित कर लिया जाता था ......
अपनी कोर्स की कापियों के पिछले पन्नो में अपने विचार लिखता, अपने अनुभव लिखता, कवितायेँ बनता.... कविताओं से याद आया मैंने आठवी से फ़ाइनल(1993) तक करीब-करीब 450 के लगभग कविताये लिखी थी, जिसका संग्रह 5 कापियों के रूप में मेरे पास था ; पर अनदेखी में न जाने वह कहाँ खो गयी....
कुल मिला कर उपरोक्त आदतों का परिणाम मेरी पढाई पर सकारात्मक रूप से पड़ा मुझे किसी भी विषय में ज्यादा पढने - उलझने और अतिरिक्त प्रयास की जरूरत नहीं पडी ... यह काल ऐसा था की जो भी पढो सीधे आत्मा द्वारा अवशोषित कर लिया जाता था ......
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