जरूरी नहीं की प्रत्येक नास्तिक व्यक्ती सात्विक हो....
आस्तिकता मनुष्य की
नकारात्मकता को नियंत्रित करती हैं, माना की मनुष्य के पास बुद्धी हैं पर
वह प्रत्येक क्षण बुद्धि को चैतन्य नहीं रख सकता वह जाने-अनजाने
बुद्धीहीनता का काम कर देता हैं बहुत से उदहारण हैं ... आस्तिकों की
अंधश्रद्धा एक तरह से परमात्मा को नकारने वाली ही बात हैं जो बुद्धीहीनता
को बढ़ावा देती हैं और व्यक्ती अपने अहंकार और अज्ञानता से मानवता को क्षति
पहुचता हैं .... प्रत्येक आस्था की मान्यताओं में सिधान्तों के साथ करुणा
का होना अत्यंत आवश्यक हैं ... जिस मान्यता में भी करुणा तत्व की कमी हैं
उसके अनुयायी पूरी मानवता को समाप्त कर देंगे .... आस्तिकता वास्तव में
मनुष्य में सात्विकता और मानवता का संचार करती हैं और मानवता,..समाज का
निर्माण करती हैं ....
बस इतना कहना हैं 'विनोद' की नास्तिक व्यक्ती
सात्विक हो तो वह नास्तिकता का दिखावा कर रहा हैं .....
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